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तू जाहिर है लफ्ज़ों में मेरे

मैं गुमनाम हुँ खामोशियों में तेरी

तजुर्बे ने एक बात सिखाई है

एक नया दर्द ही पुराने दर्द की दवाई है

बेरुख़ी इससे बड़ी और भला क्या होगी

एक मुद्दत से हमें उसने सताया भी नहीं

तुम किसी और से मालूम तो करके देखो

हम किसी ओर के कितने है और तुम्हारे कितने

आना हैं मौत तुझे तो दिन के उज़ाले में आना

रातें और ख़्वाब किसी बेवफ़ा के नाम कर रखे मैंने

मेरे सब्र का इंतेहा क्या पूछते हो.

वो मुझ से लिपट कर रोई भी तो किसी और के लिए.

शिद्दत से कोई याद कर रहा है

मुद्दत से ये वहम जाता नही

ये इश्क़ मोहब्बत की रिवायत भी अजीब है

पाया नहीं है जिसको उसे खोना भी नहीं चाहते

आज जा कर के उसने सच में भुलाया है मुझे

वरना ये हिचकियां पानी से तो नही जाती थी

कुछ पल के लीये ही मुझे अपनी बाहों में सुला लो

अगर आँख खुली तो उठा देना अगर ना खुली तो दफ़ना देना

भले ही अपने जीगरी दोस्त कम हैं

पर जीतने भी है परमाणु बम हैं

अधूरेपन का मसला ज़िंदगी भर हल नहीं होता

कहीं आँखें नहीं होतीं, कहीं काजल नहीं होता

चादँ के साथ कई दर्द पुराने निकले

कितने ग़म थे जो तेरे ग़म के बहाने निकले

दरवाज़ों के शीशे न बदलवा

लोगों ने अभी हाथ से पत्थर नहीं फेंके

तुम्हे तकलीफ न हो जरा भी चलने में

लो यह दिल चप्पल की जगह पहन लो

er kasz

वक़्त बीतने के बाद अक़्सर ये अहसास होता है कि

जो छूट गया वो लम्हा ज्यादा बेहतर था

अच्छा छोड़ो ये बहस और तक़रार की बातें

ये बताओ रात ख़्वाबों में क्यूँ आते हो

टूटी फूटी कश्ती और एक खुश्क समंदर देखा था

कल रात मैने झांक के शायद अपने अंदर देखा था !

मत पूछ की मेँ शब्द कहां से ला रहा हूँ

तेरी यादो का खजाना हैँ लुटाए जा रहा हूँ

चले आती है कमरे में दबे पाँव ही हर दफ़े

तुम्हारी यादों को दरवाज़ा खटखटाने की भी तमीज़ नहीं

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