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दिल से ही हुक्म लेते है दिल से ही सबक लेते है

आशिक कभी उस्तादो की माना नही करते

में अक्सर अकेला रेह जाता हूँ

क्युकी में हमेश उनके सहारे रेहता हूँ

er kasz

ये किस मिट्टी के बने लोग हैं ऐ मेरे परवरदिगार

जो कभी मेरे एक आँसु से तड़प उठते थे आज साथ छोड़ने कि बात करते हैं.....

आग लगाना मेरी फितरत में नही है

मेरी सादगी से लोग जलें तो मेरा क्या कसू

मैं जानता हूँ मेरी खुद्दारियां तुझे खो देंगी लेकिन

मैं क्या करूँ मुझ को मांगने से नफ़रत है

मेरी लिखी किताब मेरे ही हाथो मे देकर वो कहने लगी

इसे पढा करो मोहब्बत सीख जाओगे

er kasz

ढूंढने पर वही मिलेंगे जो खो गए हैं

वो कभी नहीं मिलेंगे जो बदल गए हैं

बदलता तो इंसान है

वक़्त तो सिर्फ एक बहाना है

सब सो गये अपने हाले दिल बयां करके

अफसोस की मेरा कोई नहीं जो मुझसे कहे तुम क्यों जाग रहे हो

बहुत रोई होगी वो खाली कागज देखकर

खत मे पूँछा था उसने जिंदगी कैसे बीत रही है

इतना भी प्यार किस काम का.
भूलना भी चाहो तो नफरत की हद्द तक जाना पड़े.

Har koi janta hai meri wafa or teri bewafai ki dasta ko

Magar afsos to es batt ka hai ke sirf tu hi anjaan hai

er kasz

अजब तमाशा है मिट्टी से बने लोगों का
बेवफ़ाई करो तो रोते हैं अगर वफ़ा करो तो रुलाते हैं...

क्यों ना सज़ा मिलती हमें मोहब्बत मैं

आखिर हम ने भी तो बहुत दिल तोड़े तेरी खातिर

हजारों चेहरों में एक तुम ही पर मर मिटे थे..
वरना..
ना चाहतों की कमी थी और ना चाहने वालों की..!

तुझे तो हमारी मोहब्बत ने मशहूर कर दिया बेवफ़ा

वरना तू सुर्खियों में रहे तेरी इतनी औकात नहीं

ये नजर चुराने की आदत आज भी नहीं बदली उनकी

कभी मेरे लिए जमाने से और अब जमाने के लिए हमसे

er kasz

कितना मुश्किल है मनाना उस शख्स को

जो रूठा भी न हो और बात भी न करे

काश वो भी बेचैन होकर कह दे मेँ भी तन्हा हूँ

तेरे बिन तेरी तरह तेरी कसम तेरे लिए

हमने बे-इंतिहा वफ़ा कर के

बे-वफ़ाओं से इंतिक़ाम लिया

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